केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मध्य प्रदेश के भोपाल में नई शिक्षा नीति (NEP) पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बच्चों में व्याप्त कुपोषण की समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए पोषण नीतियों के कार्यान्वयन और सामुदायिक भागीदारी पर सवाल उठाए।
उनका यह बयान बच्चों के पोषण की गंभीर स्थिति और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करता है।
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🍎 धर्मेंद्र प्रधान के मुख्य सवाल
धर्मेंद्र प्रधान ने मध्य प्रदेश के बच्चों की पोषण स्थिति पर बात करते हुए कहा:
- सेब और अंजीर की पहुँच: उन्होंने दावा किया कि मध्य प्रदेश के लगभग 50 लाख बच्चों ने पाँचवी कक्षा तक शायद सेब का स्वाद भी नहीं चखा होगा। उन्होंने कहा कि पौष्टिक मेवे जैसे अंजीर तो वे दसवीं कक्षा तक भी नहीं खा पाते।
- दूध की कमी: उन्होंने बताया कि कई वंचित बच्चों को जब उन्हें दूध की ज़रूरत होती है, तब उन्हें एक कप दूध भी नहीं मिल पाता।
- सरकारी नीतियों की सीमा: उन्होंने स्पष्ट किया कि पोषण नीतियों की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है, बल्कि समाज को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी, क्योंकि केवल सरकारी प्रयासों से कुपोषण की व्यापक समस्या दूर नहीं हो सकती।
🤝 समाज से अपील और बदलाव का सुझाव
प्रधान ने बच्चों के पोषण की स्थिति को सुधारने के लिए एक जन आंदोलन और सामाजिक बदलाव की अपील की:
- गुलदस्ते की जगह फल: उन्होंने नेताओं और सार्वजनिक प्रतिनिधियों से अपील की कि वे स्वागत समारोहों में फूलों के गुलदस्ते देने के बजाय, उनकी कीमत के फल या पौष्टिक खाद्य पदार्थ (जैसे काजू, अंजीर, या बेसन के लड्डू) बच्चों को दें।
- उदाहरण: उन्होंने गुजरात का उदाहरण दिया, जहां अब स्वागत में गुलदस्ते की जगह फलों की टोकरी देने का चलन शुरू हुआ है।
- बदलाव का लक्ष्य: उनका मानना था कि जब बच्चों को ऐसा पौष्टिक भोजन मिलेगा, तो वे स्वस्थ बनेंगे और उनमें से कोई अब्दुल कलाम बन सकता है।
यह बयान देश में पीएम पोषण योजना (पहले मिड-डे मील) जैसी योजनाओं के होते हुए भी, गुणवत्तापूर्ण पोषण की पहुँच सुनिश्चित करने में आ रही चुनौतियों को दर्शाता है।